क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी छत पर लगे सोलर पैनल रात के घुप्प अंधेरे में भी बिजली बना सकते हैं? यह सवाल अब सिर्फ कल्पना नहीं रहा। सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (UNSW) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसने पूरी सोलर इंडस्ट्री को हिला कर रख दिया है। बिना एक किरण धूप के, रात के अंधेरे में बिजली पैदा करना अब हकीकत बन चुका है।

सोलर पैनल की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
सालों से हम यही सुनते आए हैं कि सोलर पैनल सिर्फ दिन में काम करते हैं। रात में बिजली चाहिए तो या तो महंगी बैटरी लगाओ या फिर ग्रिड पावर पर निर्भर रहो। ग्रिड की बिजली के दाम हर साल बढ़ते जा रहे हैं और बैटरी की भी एक सीमित जीवनकाल होती है। चाहे लेड एसिड हो या लिथियम, हर चार्ज-डिस्चार्ज साइकिल के साथ बैटरी की क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है। यही वह समस्या है जिसका हल ढूंढने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक सालों से जुटे हुए थे।
UNSW की क्रांतिकारी खोज: थर्मोरेडिएटिव डायोड
साइंस का वो सिद्धांत जिसने बदल दी सोचने की दिशा
UNSW के वैज्ञानिकों ने एक सरल लेकिन गहरा सवाल उठाया: दिन भर धरती सूरज की अरबों किलोवाट गर्मी सोखती है, तो रात में वह सारी गर्मी कहां जाती है? जवाब है इन्फ्रारेड रेडिएशन में। हमारा ब्रह्मांड एक विशाल फ्रीजर की तरह है जिसका तापमान करीब -270 डिग्री सेल्सियस है जबकि रात के समय हमारी जमीन और छत का तापमान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। इस तापमान के भारी अंतर को इस्तेमाल करके बिजली बनाई जा सकती है। इस प्रक्रिया को विज्ञान में “थर्मल एमिशन” कहा जाता है।
थर्मोरेडिएटिव डायोड कैसे काम करता है?
2022 में UNSW टीम ने मर्करी कैडमियम टेलुराइड नाम के मटेरियल से एक खास डिवाइस बनाई जिसे थर्मोरेडिएटिव डायोड कहते हैं। यह एक सेमीकंडक्टर डिवाइस है जो नाइट विजन গগলस में इस्तेमाल होने वाले मटेरियल से बनी है और इन्फ्रारेड लाइट के एमिशन से बिजली पैदा करती है। यह डायोड एक साधारण सोलर सेल के बिल्कुल उलट काम करता है। जहां सोलर सेल प्रकाश को सोखकर बिजली बनाता है, वहीं थर्मोरेडिएटिव डायोड गर्मी को ठंडे अंतरिक्ष की ओर छोड़कर बिजली उत्पन्न करता है। यह टेक्नोलॉजी करंट-वोल्टेज के चौथे क्वाड्रेंट में काम करती है जो अब तक सभी टेक्स्टबुक में खाली रहता था।
2022 से 2026 तक: कितनी बड़ी छलांग?
नीचे दी गई टेबल से समझें कि इस रिसर्च ने कितनी तेजी से तरक्की की है:
| वर्ष | तकनीक | आउटपुट (प्रति वर्ग मीटर) | उपलब्धि |
| 2022 | बेसिक थर्मोरेडिएटिव डायोड | 1.5 मिलीवाट | पहली बार रात में बिजली का प्रदर्शन |
| 2024 | अपग्रेडेड डिजाइन | 8-10 मिलीवाट | Nature Photonics में प्रकाशन |
| 2026 | हेटरो जंक्शन थर्मोरेडिएटिव स्ट्रक्चर | 25 मिलीवाट | LED बल्ब जलाने में सफलता |
2022 की तुलना में 2026 में 14 गुने से भी ज्यादा की वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों ने लैब में बिना किसी बैटरी और बिना किसी रोशनी के, सिर्फ रात के आसमान की ठंडक का इस्तेमाल करके एक LED बल्ब जला कर दिखाया। यह रिन्यूएबल एनर्जी की दुनिया में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
अंतरिक्ष तक पहुंची यह टेक्नोलॉजी
UNSW की टीम को अमेरिकी वायु सेना से फंडिंग मिली है ताकि इस डायोड को और एफिशिएंट बनाकर लो-अर्थ ऑर्बिट के सैटेलाइट्स पर इस्तेमाल किया जा सके। सैटेलाइट्स हर 45 मिनट में सूरज की रोशनी और अंधेरे के बीच चक्कर लगाते हैं, और थर्मोरेडिएटिव डायोड उस अंधेरे के दौरान सहायक ऊर्जा प्रदान कर सकता है। यह टेक्नोलॉजी भविष्य में मेडिकल वेयरेबल्स और IoT सेंसर को भी बिना बैटरी के चलाने में सक्षम हो सकती है।
2026 की ग्राउंड रियलिटी: अभी कितना व्यावहारिक?
यह सवाल जरूरी है कि क्या आप आज ही अपनी छत पर नाइट सोलर पैनल लगा सकते हैं? जवाब है: अभी नहीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां अभी करीब एक दशक की रिसर्च और बाकी है और फिर इंडस्ट्री को इसे आगे बढ़ाना होगा। 25 मिलीवाट की पावर छोटे उपकरण चलाने के लिए तो ठीक है, पर आपका फ्रिज या एयर कंडीशनर चलाने के लिए यह अभी पर्याप्त नहीं है।
आज का स्मार्ट और प्रैक्टिकल हल: हाइब्रिड पावर सिस्टम
नाइट सोलर के व्यावसायिक होने का इंतजार करते हुए क्या आज की बिजली समस्या हल नहीं होगी? बिल्कुल होगी। प्रकृति ने खुद एक बेहतरीन व्यवस्था बनाई है। दिन में जब सूरज होता है तो सोलर पैनल काम करते हैं। शाम होते ही जमीन ठंडी होने लगती है और रात के समय जमीन से कुछ ऊपर हवाओं की गति अचानक बढ़ जाती है, इसे “नाइट-लेवल जेट” कहते हैं। यानी जब सोलर बंद हो, ठीक तभी विंड एनर्जी शुरू हो जाती है।
एडवांस्ड हाइब्रिड सिस्टम के फायदे
आज मार्केट में रेजिडेंशियल वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल विंड टर्बाइन आ चुके हैं जो केवल 2 से 3 मीटर प्रति सेकंड की हवा में भी काम करते हैं। 5 किलोवाट के सोलर सिस्टम के साथ यदि 1 से 2 किलोवाट का मिनी विंड टर्बाइन जोड़ दिया जाए तो पूरा सिस्टम संतुलित हो जाता है। इसके प्रमुख फायदे इस प्रकार हैं:
- बैटरी पर लोड लगभग आधा हो जाता है
- जो बैटरी पहले 3-4 साल में खराब हो जाती थी, वही 8 से 10 साल तक चलती है
- रात में भी लगातार बिजली मिलती रहती है
- बैटरी बैंक का साइज और खर्च दोनों कम हो जाते हैं
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