AuREUS Solar Panel Price: कैसे बनता है ये पैनल और कितना पावर देता है?

आज के समय में जब हर कोई सस्ती और लगातार मिलने वाली बिजली की तलाश में है, तब सोलर टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव हो रहा है। इसी बदलाव के बीच एक ऐसी नई टेक्नोलॉजी सामने आई है, जो पारंपरिक सोलर पैनलों से बिल्कुल अलग है और आने वाले समय में बिजली बनाने का तरीका बदल सकती है। इस टेक्नोलॉजी का नाम है AuREUS Solar Panel। यह तकनीक खास इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ धूप पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि UV किरणों से भी बिजली बना सकती है। यही वजह है कि इसे भविष्य की “स्मार्ट सोलर टेक्नोलॉजी” माना जा रहा है।

AuREUS Solar Panel Price

AuREUS Solar Panel क्या है?

AuREUS का पूरा नाम Aurora Renewable Energy and UV Sequestration है और इसे फिलीपींस के युवा इंजीनियर Carvey Ehren Maigue ने विकसित किया है। यह एक ऐसी सोलर टेक्नोलॉजी है जो पारंपरिक पैनलों से अलग तरीके से काम करती है। सामान्य सोलर पैनल केवल सूरज की सीधी रोशनी पर निर्भर होते हैं, जबकि AuREUS UV यानी अल्ट्रावायलेट किरणों को पकड़कर भी बिजली बना सकता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे काम करने के लिए तेज धूप की जरूरत नहीं होती। यह बादलों वाले मौसम, छाया या इमारतों से टकराकर आने वाली रोशनी से भी बिजली पैदा कर सकता है। यही कारण है कि इसे शहरों में उपयोग के लिए बहुत उपयोगी माना जा रहा है, जहां ऊंची इमारतों की वजह से सीधी धूप कम मिलती है।

यह तकनीक इतनी एडवांस है कि इसे खिड़कियों, दीवारों और यहां तक कि बड़ी-बड़ी इमारतों के ग्लास पर भी लगाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में पूरी बिल्डिंग खुद एक पावर जनरेटर बन सकती है।

AuREUS Solar Panel कैसे बना और इसका इनोवेशन क्या है?

इस अनोखी तकनीक की शुरुआत साल 2017 में हुई थी, जब इसके इनोवेटर को प्रकृति के एक अद्भुत दृश्य ऑरोरा यानी Northern Lights से प्रेरणा मिली। इसी प्रेरणा के आधार पर उन्होंने 2019 में इसका पहला प्रोटोटाइप तैयार किया। इस शानदार इनोवेशन के लिए उन्हें 2020 में James Dyson Sustainability Award भी मिला, जो दुनिया के सबसे बड़े डिजाइन अवॉर्ड्स में से एक माना जाता है।

AuREUS पैनल को बनाने की प्रक्रिया भी काफी खास और पर्यावरण के अनुकूल है। इसमें खराब या बर्बाद हो चुके फल और सब्जियों का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले इन फलों और सब्जियों को क्रश करके उनका जूस निकाला जाता है। इसके बाद इस जूस से खास luminescent compounds निकाले जाते हैं, जो UV किरणों को पकड़ने की क्षमता रखते हैं।

इन compounds को एक पारदर्शी रेजिन में मिलाकर एक रंगीन शीट बनाई जाती है, जो देखने में ग्लास जैसी लगती है। इसके बाद इस शीट के किनारों पर छोटे-छोटे सोलर सेल लगाए जाते हैं। इस तरह एक ऐसा सोलर पैनल तैयार होता है, जो पारदर्शी या रंगीन हो सकता है और आसानी से बिल्डिंग में फिट हो जाता है।

इस टेक्नोलॉजी की खास बात यह है कि इसमें लगभग 80% सामग्री प्राकृतिक यानी फसल के कचरे से आती है। भविष्य में इसे 100% eco-friendly बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

AuREUS Solar Panel कैसे काम करता है?

AuREUS सोलर पैनल का काम करने का तरीका पारंपरिक पैनलों से बिल्कुल अलग और काफी दिलचस्प है। इसमें एक खास प्रक्रिया होती है जिसे photoluminescence कहा जाता है। जब UV किरणें इस पैनल पर गिरती हैं, तो अंदर मौजूद luminescent particles उन्हें absorb कर लेते हैं और फिर उन्हें visible light यानी सामान्य रोशनी में बदल देते हैं।

इसके बाद यह रोशनी पैनल के अंदर ही reflect होकर किनारों की तरफ जाती है, जहां लगे हुए photovoltaic cells इसे पकड़ लेते हैं और DC बिजली में बदल देते हैं। इस तरह बिना सीधी धूप के भी बिजली बन जाती है।

इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पैनल को सूरज की दिशा में लगाने की जरूरत नहीं होती। इसे दीवारों, खिड़कियों या किसी भी वर्टिकल सतह पर लगाया जा सकता है। यही वजह है कि इसे “Vertical Solar Farming” का नाम भी दिया जा रहा है।

इसके अलावा यह बादलों वाले दिनों में भी अच्छी तरह काम करता है, जबकि पारंपरिक सोलर पैनल ऐसे समय में काफी कम बिजली पैदा करते हैं। यह टेक्नोलॉजी खासकर उन जगहों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है जहां मौसम अक्सर बदलता रहता है या धूप कम मिलती है।

AuREUS Solar Panel Price, Power Output और फायदे

अगर बात करें इसकी कीमत की, तो अभी यह टेक्नोलॉजी पूरी तरह से कमर्शियल मार्केट में उपलब्ध नहीं है। फिलहाल यह प्रोटोटाइप और पायलट स्टेज में है, इसलिए इसकी सटीक कीमत तय नहीं हुई है। हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू होने के बाद इसकी कीमत पारंपरिक सोलर पैनलों के आसपास या उससे थोड़ी ज्यादा हो सकती है।

पावर आउटपुट की बात करें तो शुरुआती परीक्षणों में यह सामने आया है कि AuREUS पैनल लगभग 48 से 50 प्रतिशत समय बिजली बना सकता है, जबकि सामान्य सोलर पैनल केवल 15 से 22 प्रतिशत समय ही प्रभावी ढंग से काम करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इसकी efficiency ज्यादा है, बल्कि यह ज्यादा समय तक एक्टिव रहता है।

एक छोटे प्रोटोटाइप पैनल से रोजाना दो मोबाइल फोन चार्ज किए जा सकते हैं। इसके अलावा एक किलो फसल के कचरे से लगभग 100 वाट के आसपास बिजली उत्पन्न करने की क्षमता भी देखी गई है। यह टेक्नोलॉजी खासकर शहरों में ज्यादा उपयोगी हो सकती है, जहां जगह की कमी होती है।

इसके फायदे भी काफी जबरदस्त हैं। यह पैनल बादलों में भी काम करता है, फूड वेस्ट का उपयोग करता है, पर्यावरण के लिए सुरक्षित है और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा यह UV किरणों से सुरक्षा भी देता है और इमारतों को एक पावर जनरेशन यूनिट में बदल सकता है।

भारत जैसे देश में, जहां एक तरफ कृषि कचरा बहुत ज्यादा है और दूसरी तरफ बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, वहां यह टेक्नोलॉजी एक बड़ा बदलाव ला सकती है। आने वाले समय में अगर यह टेक्नोलॉजी सस्ती और आसानी से उपलब्ध हो जाती है, तो यह सोलर इंडस्ट्री में एक नई क्रांति ला सकती है।

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